(तर्ज -ना धन है ना दौलत है…)
ना स्वर है का सरगम है, ना लय ना तराना है,
हनुमान के चरणों में, एक फूल चढ़ाना है।।
तुम बाल समय में प्रभु, सूरज को निगल डाले,
अभिमानी रावण के, सब दर्प मसल डाले,
बजरंग हुए तब से, संसार ने जाना है।।
सब दुर्ग ढहा कर के, लंका को जलाए तुम,
सीता की खबर लाए, लक्ष्मण को जिलाये तुम,
प्रिय भरत सरिस भाई, श्री राम ने माना है।।
जब राम नाम तुम ने पाया ना नगीने में,
तुम चीर दिए सीना, सीयाराम थे सीने में,
विस्मित हो सब देखे, कपि राम दीवाना है।।