पिंजरा
(लय : तैरापंथ महान रे)
रे पंछी इस पिंजरे का तू क्या करता अभिमान रे आखिर पिंजरा पिंजरा ही है, तु है बन्दीवान रे।
कुदरत ने मिट्टी का तेरा प्यारा पिंजरा बना दिया,
खुब सजाया बाहर से, और रंग सुनहरा चढ़ा दिया,
पर अन्दर से कैसा है यह सोच जरा इन्सान रे।
आज पुष्ट यह पिंजरा तेरा, कल ढ़ीला पड़ सकता है, नवयौवन का रंग गुलाबी, कल पीला पड़ सकता है,
क्या जाने कब धोखा दे दे, यह पिंजरा नादान रे।
आखिर
मिट्टी के पिंजर से तुने इतना मोह लगा लिया
अपना कौन पराया क्या है, यह भी भान भुला दिया। बंधन को बंधन नही समझा, यह कैसा अज्ञान रे।
आखिर
मिट्टी का यह पिंजरा तेरा, मिट्टी मे मिल जायेगा नही साथ कुछ लेकर आया नही ले जाने पायेगा,
चम्पक करले धर्म कमाई, हो जाये कल्याण रे।
॥