(तर्ज – उड उडरे म्हारा काला रे कागला …)
सुण सुण ए म्हारी कंवर लाडली, अव थान सासरीय जाणो पड़सी, सासुजी री हाजरी बजानी पड़सी । बुढ़ी थांरी है दादे सासु, लकड़ी देर उठाणो पड़सी – सासुजी
जाडी मोटी है धारी सासु, सुबह शाम पैर दबाणो पड़सी … सासुजी …. दुबली पतली है काके सासु, हलवो घोट खिलाणो पड़सी … सासुजी … काली काली थारी जीठाणी, पीठी रोज रगड़नी पड़सी … सासुजी
चुगलीखोर है थारी नणदल, वेन समझके निभाणो पड़सी … सासुजी
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