भिक्षु स्तुति (लय- संयम मय जीवन हो)
रचयिता -साध्वी श्री रतनश्रीजी
ॐ भिक्षु भिक्षु नित ध्यावां
ॐ भिक्षु भिक्षु नित ध्यावां । भिक्षु की म्हे अलख जगाकर आनन्दित बण ज्यावां ।।
१. प्रातः भिक्षु सांयः भिक्षु, चलतां फिरतां भिक्षु,
उठतां भिक्षु, सोतां भिक्षु, तन में मन में भिक्षु ।
भिक्षु-भिक्षु-भिक्षु-भिक्षु, भिक्षु रो ध्यान लगावां ।।
२. विघ्न हरण मंगलकारी है, भिक्षु नाम सदा रो,
जंगल में मंगल हो ज्यावै, भिक्षु नाम सहारो ।
भिक्षु-भिक्षु जपतां टूटी, बेड्यां विस्मय पावां ।।
३. भिक्षु बाबो संघ हितेषी, योगक्षेम नित चावै,
सकंट की घड़ियां में सन्मुख, आकर सदा बचावै । त्यागमूर्ति रो चित्र सामनै, देख-देख हर्षावां ।।
४. नाम भिक्षु रो है मंत्राक्षर, रिद्धि-सिद्धि रो दाता,
जीवन नैया रो संचालक, भिक्षु भाग्य विधाता ।
श्रीं धीं धृति संपन्न बण, मन में संकल्प सजावां ।।
५. भिक्षु नाम दवा गुणकारी, सारा रोग मिटावां,
महाप्रज्ञ रो पथ-दर्शन पा, आगे कदम बढ़ावां
भिक्षु शासन री गरीमां नै, च्यारूं ओर फैलावां