पर्युषण प्यारा
(लय : जहां डाल डाल पर….)
जहां जनम जनम के वैर भाव का होता है निस्तारा।
ये दिन संवत्सरी प्यारा-२
जहां प्राणी मात्र से प्रेम भाव का जो करता है इशारा
ये पर्व पर्युषण प्यारा-२
जय शासनम् जिन शासनम् ।। ध्रुव ।।
यहां कालचक्र की गति बनाई, नहीं अंत नहीं आदि’
घट बढ़ होती षटचक्रों की, यह रीत कही है अनादि
उत् अवसर्पिणी दो नाम मुख्य, आगे सुनना अब ब्यौरा ।१।।
अवसर्पिणी का छठ्ठा पूरा, जब हो गया दुखम् दुःखा। उत्सर्पिणी का पहला भी पूरा, हुआ अंतराय संरण’।
फिर तीजा या चौथा कहा, जो ले आया सुख सिंगारा ।।२।।
तीजे आरे की पहली श्रावण, सुध पूनम जब आई।
तब सात दिवसकी लगातार, वर्षा सबके मन भाई।
यूं नीर क्षीर धृत अमृत, नामक बरसी वर्षा धारा ।।३।।
ये दिन……
उस तप्त धरा पर, क्रम क्रम से, जब वर्षा धारा बरसी।हजारों वर्ष के बाद जमीं पर, हरियाली थी सरसी।
उन पचास दिवस के बाद, उदित हुआ पांचम का दिन प्यारा ।।४।।
हम तड़फ तड़फ कर मरते थे, और करते थे खूब झगड़ा’।
अब निसर्ग ने ही खुश होकर के, मिटा दिया सब रगड़ा। यूं सोच महापुरूषों ने उस दिन, बैर भूलाया सारा ।।५।।
यह विश्व मैत्री का शुभ दिन सबको, ध्यान जरूर है रखना।
यह ऋषि पंचमी कहने आई, खुद को खुद ही परखना’। मिलजुल हम सब प्रीतिमय बनकर चाहें आत्म सुधारा ।।६।।