(लय- धर्म की लौ जलाए हम)
जय जय जगदीश्वर महावीर -2
तीर्थकर बन गए तोड़ कर कर्मों की जंजीर
चंड सर्प को डंक लगाया प्रभु ने करुणा रस बरसाया, हुई नकिञ्चित कमपित् काया, राग द्वैष की पड़ी न छाया द्वेषकी समता और सहजता से बन गये शांत गम्भीर
② अनेकान्त मय अमृतवाणी अंकित उसकी अमिटकहानी
आत्मा अजर अमर पहचानी कर्म कटख से हार न मानी
आत्म तुला पर तुले बढ़े सब बाधाओं को चीर
③ वीतराग हो क्षमा मूरति हो जाग्रत, दिल में नई स्फूर्ति हो एक विपदाओं मे धैर्य अटल हो
अन्तर चेतन पूर्ण संबल हो
आमशक्ति के अन्वेषण से पाए भव जल तीर
4) दिव्य दीदार दमकता दिनकर दीप्तीमान अवनि तल अम्बर
पंथ मुक्ति का है क्षेमंकर ,मृत्युजंय प्रतिबोध शुभंकर
कठिन साधना सहे परिषह तेज पुंज तस्वीर