(तर्ज- संसार है इक नदियां)( रफ़्तार)
महावीर की वाणी को घर-2 पहुंचाना है
निर्वाण महोत्सव को, जो सफल बनाना है।
बलिदान प्रधाओं से धरती भी थराई
अवतार लिया प्रभु ने सुख सरिता लहराई
सिखलाई लाई जीव दया, उसको न भुलाना है।
जीयो और जीने दो सदभाव रहे मन में
गिनती के सांस भरे इस माटी के तनमें
अनिमात बेध गार हमें दूर लगाना है। गाया हम
हिसां प्रतिहिंसा से पापों का बोझ बढे
और सत्य अहिंसा ही भव भव के कर्महरे
नवकार सदा जपना जो मुक्ति पाना है