णमो गुरुदेवाणं
(लयः श्रद्धा विनय…..)
रचयिता : साध्वी सिद्धप्रज्ञाजी
उगी सुनहली भोर, णमो गुरुदेवाणं ।
प्रमुदित है हर पोर, णमो आयरियाणं ।।
१. तेरापंथ के भाग्य निराले,
एक-एक से बढकर आले ।
भैक्षवगण सिरमौर ।।
२. आर्य भिक्षु की अभिनव शैली,
ना कोई अपना चेला चेली ।
अनुशासन की डोर ।।
३. धर्म-क्रांति की उज्जवल धारा,
युग-मानव को मिले किनारा ।
वरदायी हर मोड़ ।।
४. दिव्य भव्य व्यक्तित्व निखारा,
सहज समर्पण प्रज्ञा द्वारा ।
चिंतन नया नकोर ।।
५. नियति भाग्य पुरुषार्थ-त्रयी तुम,
प्रज्ञा से पग-पग विजयी तुम ।
‘तुलसी’ दिल की कौर ।।