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पदम प्रभू नित समरियै।
1. निर्लेप पदम जिसा प्रभू, प्रभु पद्म पिछाण।
संयम लीधो तिण समै, पाया चोथो नाण ॥
2. ध्यान शुकल प्रभु ध्याय नें, पाया केवल सोय। दीनदयाल तणी दशा, कैणी नावै कोय ॥
3. सम दम उपशम रस भरी, प्रभु! आपरी वाण।
त्रिभुवन तिलक तूं ही सही, तूं ही जनक समान ॥
4. तूं प्रभु कल्पतरू जिसो, तूं चिंतामणि जोय।
समरण करतां आपरो, मन-वंछित होय ॥
5. सुखदायक सहु जग भणी, तूं ही दीनदयाल।
शरण आयो तुझ साहिबा! तूं ही परम कृपाल ॥
6. गुण गातां मन गह-गहै, सुख संपति जाण।
विघन मिटै समरण कियां, पार्मे परम कल्याण ॥
7. उगणीसे नैं भाद्रवै, सुदि बारस देख।
पद्म प्रभू रट्या लाडनूं, हुओ हरष विशेष ॥
लब : कुशलपुरी में प्रभु जनमिया