सूरज तपे तपे रे माटी
सूरज तपे तपे रे माटी, दीपक जले जले रे बाती तुझको तपना होगा, तुझको तपना होगा तप ही तो माटी को गागर बनाये गागर में सागर सहज ही समाये माटी का अर्पण, समर्पण जब होगा मुक्ति का अर्पण, वरण तब ही होगा। तुमको……. तपअग्नि के तप से, तू हो जारे कुन्दन तप से ही मिटते है, जन्मों के बंधन तप ही तो मुक्ति का अंतिम जतन है। तुमको तप यानि इच्छाओं को शांत करना तप यानि विषयों से मन को हटाना तप यानि आत्मा को निर्मल बनाना तप ही तो आत्मा का सही कथन है। तुमको तप में ही तो आत्मा का सत्य समाया तप ही ने जीव को मोक्ष दिलाया विद्याधर को विद्यासागर बनाया संतो के संत शिरोमणि बनाया तप ही तो आत्मा का सही वतन है। तुमको
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जैसे सूरज की गर्मी से
जैसे सूरज की गरमी से, जलते हुए तन को,
मिल जाए तरुवर की छाया।
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है मैं, जब से शरण तेरी आया,
भटका हुआ मेरा मन था कोई, मिलना रहा था सहारा। लहरों से लड़ती हुई नाव को जैसे, मिल ना रहा हो किनारा। उस लड़खड़ाती हुई नाव को ज्यों, किसी ने किनारा दिखाया ।। ऐसा ही सुख …
. जिस राह से मंजिल पे तेरा मिलन हो, उस पर कदम मैं बढ़ाऊँ।
फूलों में, खारों में, पतझड़ बहारों में, मैं ना कभी डगमगाऊँ। युग-युग से प्यासी मरुभूमि ने जैसे सावन का संदेश पाया।। ऐसा ही सुख
शीतल बने आग चंदन के जैसी, पारस कृपा हो जो तेरी। उजियारी पूनम-सी हो जाएँ रातें, जो थीं अमावस अंधेरी। पानी के प्यासे को तकदीर ने जैसे भी भर के अमृत पिलाया ।।