Suraj Ka Ugna Yad Raha

सूरज का उगना याद रहा

(तर्ज : दिल लूटने वाले…)
रचयिता : साध्वी कनकश्री
सूरज का उगना याद रहा, पर दिन का ढलना भूल गये । पलकों में सपने मंजिल के, पांवों से चलना भूल गये ।।
गंभीर समस्याओं का सागर, इधर उधर लहराता है । लहरों के साथ बहे जाते, बांहों से तरना भूल गये ।। १ ।।
सुख बांट-बांट भोगा जाता, दुःख भोगे सभी अकेले ही । जीते हैं औरों के खातिर, अस्तित्व स्वयं का भूल गये ।। २ ।।
अविराम बही जाती जीवन की, धारा समय धरातल पर । क्यों भोर भरी दास्तान शांति, समता की लिखना भूल गये ।। ३ ।।
सब खड़े मौत की लाईन में, कब किसका नंबर आ जाए । तुम रचा अमरता की मेहंदी, मृत्युंजय बनना भूल गये ।। ४ ।।
मंदिर-मंदिर में ढूंढ रहे, कब से ज्योतिर्मय ईश्वर को । जीवन मंदिर में सदाचार का, दीप जलाना भूल गये ।। ५ ।।
जब कल्पवृक्ष बीज और अमृत के कलश पास में है । तब “कनक” स्वयं की राहों में, क्यों फूल खिलाना भूल गये ।। ६ ।।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top