(लयः पायलिया)
रचयिता : साध्वी यशोधराजी
ॐ भिक्षु जय भिक्षु
ॐ भिक्षु जय भिक्ष, मंत्र बड़ा ही सुखकार रे तन्मय हो जपने से, होगा निश्चित ही बेड़ा पार रे, सांवरिया हो…हो..हो.., दीपांलाल हो…हो…हो.. ।। नाम तेरा संकट मोचक, जन-मन रोचक, मंगलकारी हो…. प्रभुवर… हो ।।
१. भिक्षु तू मेरा राम है, तू ही मेरा घनश्याम, मेरे दिल की हर धड़कन में, है भिक्षु तेरा नाम । तू है जीवन की ज्योति, तव चमक-दमक कलधौती, तकदीर सराहें पाकर, तुम जैसा दिव्य दिवाकर ।
तेरे बलिदानों से, गण नींवें गहरी, शासन आब बढ़ाएं, बन गण प्रहरी हो, प्रभुवर हो ।।
२. शिव शंकर तुम कहलाए, विष की घंटों को पीकर, आगम मन्थन से पाया, वो तत्त्व दिया खुद जीकर । तूं है समता का सागर, गुण रत्नों का तूं आकर, तूं है धरती का सूरज, कण-कण है हुआ उजागर । तेरी सूझ-बूझ से, तेरापथ पाएं, उतरा स्वर्ग धरा पर, मन उपवन सरसाएं हो, प्रभुवर हो ।।
३. कष्टों में ना घबराएं, आगे बढ़ते ही जाएं, फौलादी संकल्पों से, इतिहास नया गढ़ पाएं । गण की आदर्श मीनारें, निरखें नित नए नजारे, अपना हम रूप निहारें. शासन में मलय बहारें । भिक्षु चेतना जागे, बुहारें पथ के कांटे, प्रज्ञा दीप जलाएं, घर-घर अमृत बांटें हो, प्रभुवर हो ।।