।। श्री श्याम वन्दना ।।
(तर्ज-बचपन की मोहब्बत…)
दिल की हर धड़कन से, तेरा नाम निकलता है।
कान्हा तेरे दरशन को, तेरा दास तरसता है ।। टेर।।
जन्मो पे जन्म लेकर, मै हार गया मोहन,
*दर्शन बिन व्यर्थ हुआ, हर बार मेरा जीवन ।
अब धीर नहीं मुझमें, कितना तूं परखता है ।।१।।
कान्हा तेरे..
शतरंज बना जग को, क्या खेल सजाया है,
मोहरों की तरह हमको, क्या खूब नचाया है,
ये खेल तेरे न्यारे, तूं ही तो समझता है ।। २ ।।
कान्हा तेरे..
कर दो न दया मोहन, दातार कहाते हो,
नयनों का नीर कहे, क्यूँ बार लगाते हो
, ‘नन्दु दिल का दिल में, अरमान मचलता है ।। ३ ।। कान्हा तेरे..