9
सुविधि प्रभु स्तवन
सुविधि भजियै शिरनामी हो।
1. सुविधि करि भजियै सदा, सुविधि जिनेश्वर स्वामी हो। पुष्पदंत नाम दूसरो, प्रभु अंतरयामी हो॥
2. श्वेत वरण प्रभु शोभता, वारू वाण अमामी हो। उपशम रस गुण आगली, मेटण भव भव खामी हो॥
3. समवसरण बिच फाबता, त्रिभुवन-तिलक तमामी हो। इंद्र थकी ओपै घणां, शिव-दायक स्वामी हो।
4. सुरेंद्र नरेन्द्र चन्द्र ते, निरख-निरख धापै नहीं, इंद्राणी अभिरामी हो। एहवो रूप अमामी हो॥
5. मधुकर मरंद तणी परै, सुर नर करत सलामी हो। तो पिण राग व्यापै नहीं, जीत्यो मोह हरामी हो॥
6. जे जोधा जग में घणां, सिंह साथे संग्रामी हो। तें मन इन्द्री वश करी, जोड़ी केवल पामी हो॥
7. उगणीसै पूनम भाद्रवी, प्रणमूं शिरनामी हो। मन-चिंतित वस्तु मिले, रटियां जिन स्वामी हो॥
लय : सोही तेरापंथ पावै हो