Kaisi Vaha Komal Kaya Re (Mahapran Gurudev)

महाप्राण गुरुदेव
कैसी वह कोमल काया रे, पुष्पों ने शीश झुकाया रे, कंचन सी कोमल काया रे, महाप्राण महाप्राण महाप्राण गुरुदेव । गुरुदेव । गुरुदेव ।।
१. कानों की छटा निराली, आंखें इमरत की किसने सौंदर्य सझाया रे, महाप्राण प्याली । गुरुदेव ।।
२. माधुर्य कंठ में घोला, ममता को किसने तोला । वात्सल्य मूर्त बन पाया रे, महाप्राण गुरुदेव ।।
३. तुमने जो ग्रन्थ गढ़ा है, वह सबके शीश चढ़ा है । शाश्वत का स्वर लहराया रे, महाप्राण गुरुदेव ।।
४. शासन को खूब संवारा, अनुशासन गजब निहारा । शीतल-शीतल सी छाया रे, महाप्राण गुरुदेव ।।
५. जीवन भर काम करूंगा, गण का भंडार संकल्प अटूट निभाया रे, महाप्राण भरूंगा । गुरुदेव ।।
६. श्रम पल-पल अविकल चलता, अनुभव का सुरतरु फलता । पौरुष का मूल्य बढ़ाया रे, महाप्राण गुरुदेव ।।
७. जग परिवर्तन का प्यासा, तुमसे थी उसको आशा । यह कैसा दृश्य दिखाया रे, महाप्राण गुरुदेव ।।
८. ‘तुलसी’ यह नाम पियारा, तुलसी का नाम सहारा । अद्भुत सौरभ महकाया रे, महाप्राण गुरुदेव ।।
९. तुम भिन्न देह से स्वामी, आत्मा के अन्तर्यामी । जागृति का पाठ पढ़ाया रे, महाप्राण गुरुदेव ।।
१०. तुम जीवन के निर्माता, प्रभु ! मेरे भाग्य है अलख अगोचर माया रे, महाप्राण विधाता । गुरुदेव ।।
११. गुरुवर की बढ़े प्रतिष्ठा, यह ‘महाप्रज्ञ’ की निष्ठा । जय विजय-ध्वज लहराया रे, महाप्राण गुरुदेव ।।
लय : दीपांवाले नंद
रचयिता : आचार्यश्री महाप्रज्ञ

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