(तर्ज-श्याम तेरी वंशी (गीत गाता चल)
वीर तेरा सुमिरन करू मै सुबह शाम
ऐसे ही काटू मै कर्मो के वाण
त्रिशला के नन्दन को लाखो प्रणाम
झुक झुक कर गाता रहूं में गुणगान
भक्ति की राहो में बाधा न आए
कितने भी गम हो सभी भूलजाए
ऐसा ही वर दो है किरपा निधान
तुम मेरे स्वामी हो तुमही विधाता
तेरे ही सागर में गोता लगाता
ऐ मेरे प्रभुवर क्या होगा अंजाम
दुनिया में फिर से वो ज्योति जलावो
मुक्ति की राहो में सबको लगावो
चलता रहे मित्र मंडल का ध्यान