Chaubisi

Chaubisi

Mahavir Prabhu Stavan 24

24 chobisi महावीर प्रभु स्तवन नहीं इसो दूसरो जगवीर,  उपसर्ग सहिवा अडिग जिनवर, सुरगिरि जेम सधीर। 1. चरम जिनेन्द्र चौबीसमा रे, अघ हणवा महावीर। विकट तप वर ध्यान धर प्रभु, पाया भव जल तीर ॥ 2. संगम दुख दिया आकरा पिण, सुप्रसन्न निजर दयाल। जग उद्धार हुवै मो थकी रे, ए डूबै इण काल ॥ […]

Chaubisi

Parshvnath Stavan 23

23 पार्श्वनाथ प्रभु स्तवन पारस देव! तुम्हारा दर्शन भाग भला सोई पावे हो।  भाग भला सोई पावे, हूं वारि जाऊं, जीव मगन हो ज्यावै हो पारस देव । 1. लोह कंचन करै पारस काचो, ते कहो कर कुण लेवे हो। पारस तू प्रभू साचो पारस, आप समो कर देवै हो । 2. तुझ मुख-कमल पासै

Chaubisi

Arishat Nemi Prabhu Stavan 22

22 अरिष्टनेमि प्रभु स्तवन प्रभु नेम स्वामी! तूं जगनाथ अंतरयामी। रिठनेम स्वामी! तूं जगनाथ अंतरयामी ॥ 1. तूं तोरण स्यूं फिर्यो जिन-स्वाम, अद्भुत बात करी तें अमाम। प्रभु नेम स्वामी! तूं जगनाथ अंतरयामी ॥ 2. राजिमती छांडी जिनराय, शिव-सुन्दर स्यूं प्रीत लगाय। प्रभु नेम स्वामी! तूं जगनाथ अंतरयामी॥ 3. केवल पाया ध्यान वर ध्याय, इन्द्र

Chaubisi

Nami Prabhu Stavan 21

21 नमि प्रभु स्तवन प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे। मुझ प्यारा प्राण आधारा ॥ 1. नमिनाथ अनाथां रा नाथो रे, नित्य नमण करूं जोड़ी हाथो है। कर्म काटण वीर विख्यातो, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे॥ 2. प्रभु ध्यान सुधारस ध्याया रे, पद केवल जोड़ी पाया रे। गुण उत्तम-उत्तम आया, प्रभु नमिनाथजी मुझ प्यारा रे॥ 3.

Chaubisi

Muni Svuart Prabhu Stavan

20 मुनिसुव्रत प्रभु स्तवन प्रभूजी ! आप प्रबल बड़ भागी। त्रिभुवन दीपक सागी रा॥ 1. सुमित्रनन्दन श्री मुनिसुव्रत, जगतनाथ जिन जाणी। चारित्र ले केवल उपजायो, उपशम रस नीं वाणी रा॥ 2. चौतीस अतिशय पैंतीस वाणी, निरखत सुर इन्द्राणी। संवेग रस नीं वाणी सांभल, हरष स्यूं आंख्यां भराणी रा॥ 3. शब्द-रूप-रस-गंध-परस, प्रतिकूल न हुवै तुम आगे।

Chaubisi

Malli Prabhu Stavan

मल्लि जिनेश्वर नाम समर तरण शरण आयो। 1. नील वर्ण मल्लि जिनेश्वर, ध्यान-निर्मल घ्यायो। अल्प काल मांहि प्रभु, परम-ज्ञान पायो । 2. कल्प पुष्पमाल जेम, सुगंध तन सुहायो। सुर-वधू वर नयन-भ्रमर, अधिक ही लिपटायो। 3. स्व पर चक्र विविध विघन, मिटत तो पसायो। सिंघनाद थकी गजेन्द्र, जेम दूर जायो । 4. वाण विमल निमल सुधा-रस

Chaubisi

Ar Prabhu Stavan

18 अर प्रभु स्तवन अर जिनराज। मोनें प्यारा लागै छै जी मोनें वाल्हा लागे छै जी अर जिनराज ॥ 1. अर जिन कर्म-अरी नां हंता, जगत उधारण जहाज। मोनें वाल्हा लागे छै जी अर जिनराज ॥ 2. परीषह उपसर्ग रूप अरी हण, पाया केवल पाज। मोनें वाल्हा लागे छै जी अर जिनराज ॥ 3. नैण

Chaubisi

Kunthu Prabhu Stavan

17 कुन्थु प्रभु स्तवन प्रभु को समरण कर नीको रे। 1. कुन्थु जिनेश्वर करुणा-सागर, त्रिभूवन सिर टीको रे। प्रभु को समरण कर नीको रे॥ 2. अद्भुत रूप अनूप कुन्थु जिन, दर्शन जग-पी को रे। प्रभु को समरण कर नीको रे॥ 3. वाण सुधा सम उपशम रस नीं, वाल्हौ जगती को रे। प्रभु को समरण कर

Chaubisi

Balihaari Ho Shanti Jinand Ki

16 शान्ति प्रभु स्तवन बलिहारी हो शांति जिणंद की। 1. शांति करण प्रभु शांतिनाथजी, शिवदायक सुखकंद की। बलिहारी हो शांति जिणंद की॥ 2. अमृत-वाण सुधा-सी अनुपम, मेटण मिथ्या मंद की। बलिहारी हो शांति जिणंद की ॥ 3. काम भोग राग द्वेष कटुक फल, विष-बेली मोह-धंघ की। बलिहारी हो शांति जिणंद की ॥ 4. राखसणी रमणी

Chaubisi

Aho Prabhu Param Dev Pyara

15 धर्म प्रभु स्तवन अहो प्रभु परम देव प्यारा। 1. धर्म जिन धर्म तणा धोरी, त्रटक मोह-पाश नाख्या तोड़ी। चरण-धर्म आतम से जोडी, अहो प्रभु परम देव प्यारा ॥ 2. शुकल ध्यानामृत रस लीना, संवेग रसे करि जिन भीना। प्याला प्रभू उपशम ना पीना, अहो प्रभु परम देव प्यारा ॥ 3. जाण्या शब्दादिक मोहजाला, रमणि-सुख

Scroll to Top