Chaubisi

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Payo Pad Jinraj No(Anant Prabhu)

14 अनन्त प्रभु स्तवन पायो पद जिनराज नौं सुध ध्यान निर्मल ध्याय भलां जी कांई ॥ 1. अनंत नाम-जिन चवदमां रे, द्रव्य चौथे गुणठाण। भावे जिन हुवै तेरमे रे, इतलै द्रव्य जिन जाण ॥ 2. जिन चक्री सुर जुगलिया रे, वासुदेव बलदेव । पंचम गुण पावै नहीं रे, ए रीत अनादि स्वमेव ॥ 3. संजम […]

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Vimal Prabhu Stavan

13 विमल प्रभु स्तवन साहिब ! शरण तिहारै हो। शरण तिहारै, शरण तिहारै, शरण तिहारै हो। विमल प्रभू! सेवक नीं अरदास, आयो शरण तिहारै हो । 1. विमल करण प्रभु विमलनाथजी, विमल आप वर रीत। विमल ध्यान धरतां हुवै निर्मल, तन मन लागी प्रीत ॥ 2. विमल ध्यान प्रभु आप ध्याया, तिण सूं हुवा विमल

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Prabhu Vasupujy Bhajle Prani

12 वासुपूज्य प्रभु स्तवन प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी! 1. द्वादशमा जिनवर भजिये, राग द्वेष मच्छर माया तजिये। प्रभु लाल वरण तन छिब जाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी॥ 2. वनिता जाणी वेतरणी, शिव-सुंदर बरवा हूंस घणी। काम-भोग तज्या किम्पाकाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी॥ 3. अंजन-मंजन स्यूं अलगा, बलि पुष्प विलेपन नहिं विलगा। कर्म काट्या ध्यान-मुद्रा ठाणी,

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Shreyans Jineshwaru

11 श्रेयांस प्रभु स्तवन श्रेयांस जिनेश्वरू! प्रणमूं नित बेकर जोड़ है। 1. मोक्ष मार्ग श्रेय शोभता, धार्या स्वाम श्रेयांस उदार रे। जे जे श्रेय वस्तु संसार में, ते ते आप करी अंगीकार है।  ते ते आप करी अंगीकार, श्रेयांस जिनेश्वरू? 2. समिति गुप्ति दुर्धर घणां, धर्म शुकल ध्यान उदार है।  ए श्रेय वस्तु शिवदायिनी, आप

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Shital Prabhu Stwan( Surat Thari Man Base)

10शीतल प्रभु स्तवन सूरत थांरी मन बसै साहिब जी।1. शीतल जिन शिवदायका साहिब जी। शीतल चन्द समान हो, निसनेही।  शीतल अमृत सारिषा साहिब जी। तप्त मिटै तुम ध्यान हो, निसनेही॥ 2. वंदै निंदै तो भणी साहिब जी ! राग द्वेष नहीं ताम हो, निसनेही।  मोह-दावानल मेटियो साहिब जी ! गुण-निप्पन तुम नाम हो, निसनेही ॥

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Suvidhi Bhajiye Sirnami Ho

9 सुविधि प्रभु स्तवन सुविधि भजियै शिरनामी हो। 1. सुविधि करि भजियै सदा, सुविधि जिनेश्वर स्वामी हो। पुष्पदंत नाम दूसरो, प्रभु अंतरयामी हो॥ 2. श्वेत वरण प्रभु शोभता, वारू वाण अमामी हो। उपशम रस गुण आगली, मेटण भव भव खामी हो॥ 3. समवसरण बिच फाबता, त्रिभुवन-तिलक तमामी हो। इंद्र थकी ओपै घणां, शिव-दायक स्वामी हो।

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Ho Prabhu Chand Jineswar Chand Jisa

चन्द्रप्रभु स्तवन (लय: शिवपुर नगर सुहामणो) प्रभु ! चन्द्र जिनेश्वर ! चन्द जिसा। 1. हो प्रभू! चंद जिनेश्वर चंद जिसा, वाणी शीतल चंद सी न्हाल हो। प्रभु! उपशम रस जन सांभल्यां  मिटे करम भरम मोह जाल हो । 2. हो प्रभु! सूरत मुद्रा सोहनी, वारु रूप अनूप विशाल हो। प्रभु! इंद्र शची जिन निरखता, ते

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Bhajiye Nitya Swami Supas A

7 (लय : कृपण दीन अनाथ ए) सुपार्श्वप्रभु स्तवन भजियै नित्य स्वामी सुपास ए। 1. सुपास सातमां जिणंद ए, ज्यांनै सेवै सुर नर बंद ए। सेवक पूरण आश ए, भजिये नित्य स्वामी सुपास ए॥ 2. जन प्रतिबोधण काम ए, प्रभु बागरै वाण अमाम ए। संसार स्यूं हुवै उदास ए, भजिये नित्य स्वामी सुपास ए॥ 3.

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Padam Prabhu Nit Samriye

6 पदम प्रभू नित समरियै। 1. निर्लेप पदम जिसा प्रभू, प्रभु पद्म पिछाण।  संयम लीधो तिण समै, पाया चोथो नाण ॥ 2. ध्यान शुकल प्रभु ध्याय नें, पाया केवल सोय। दीनदयाल तणी दशा, कैणी नावै कोय ॥ 3. सम दम उपशम रस भरी, प्रभु! आपरी वाण।  त्रिभुवन तिलक तूं ही सही, तूं ही जनक समान

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Sumati Jineswar Sahib Shobhta

5 सुमति प्रभु स्तवन (लय : मूरख जीवड़ा रे गाफल मत रहे) सुमति जिनेश्वर साहिब शोभता। 1. सुमति जिनेश्वर साहिब शोभता, सुमति करण संमार सुमति जप्यां थी सुमति बधे घणी, सुमति सुमतिदातार ॥ 2. ध्यान सुधारस निरमल ध्याय ने पाम्या केवल नाज। बाण सरस वर जन बह तारिया, तिमिर हरण जगभाण ॥ 3. फटिक-सिंहासण जिनजी

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