यह जैन तपस्या और अनुमोदना के अवसरों पर गाया जाने वाला आध्यात्मिक गीत है। A spiritual song for Jain Tapasya and Anumodana.
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उठ जाग मुसाफिर
उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहां जो सोवत है। जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है॥
उठ नींद से अखियां खोल जरा,
और अपने प्रभु से ध्यान लगा।
यह प्रीत करन की रीत नहीं,
प्रभु जागत है, तू सोवत है।
उठ जाग मुसाफिर…
जो कल करना सो आज कर ले,
जो आज करना सो अब कर ले।
जब चिड़ियों ने चुग खेत लिया,
फिर पछताए क्या होवत है।
उठ जाग मुसाफिर…
नादान भुगत करनी अपनी,
ओ पापी! पाप में चैन कहां।
जब पाप की गठरी शीश धरी,
फिर शीश पकड़ क्यों रोवत है।
उठ जाग मुसाफिर…