लय : होली आई रे….
रचयिता : मुनि कन्हैयालालजी
तपस्या करल्यो रे,
हो तपस्या करल्यो रे, भव-भव का पातक, सगळा हरल्यो रे, तपस्या करल्यो रे।।
काल अनन्तो बीत्यो भटकल, भव सागर नै तरल्यो रे, कर्मां रा अब बृन्द खपाकर, शीवपुर वरल्यो रे, तपस्या करल्यो रे।।
आत्मिक बल स्यूं तपस्या होवै, कमजोरी नै हरल्यो रे, मन मजबूती राख शान्ति रो, पंथ पकड़ल्यो रे, तपस्या करल्यो रे।।
घोर तपस्वी सुख मुनिवर रो, ध्यान निरन्तर धरल्यो रे, भूरांजी अणचांजी सती नै, पल-पल स्मरल्यो रे।
तपस्या करल्यो रे।।
तपस्या रूपी शुभ संपति स्यूं, आत्म खजानों भरल्यो रे, अंतर मन रो रोग मिटावण, औषध लेल्यो रे।
तपस्या करल्यो रे।।
स्वामीजी रो शासन साचो, पुन्यायी स्यूं पायो रे, मुनि कन्हैया तुलसी भायो रे,