Author name: Sunita Dugar

Chaubisi

Ar Prabhu Stavan

18 अर प्रभु स्तवन अर जिनराज। मोनें प्यारा लागै छै जी मोनें वाल्हा लागे छै जी अर जिनराज ॥ 1. अर जिन कर्म-अरी नां हंता, जगत उधारण जहाज। मोनें वाल्हा लागे छै जी अर जिनराज ॥ 2. परीषह उपसर्ग रूप अरी हण, पाया केवल पाज। मोनें वाल्हा लागे छै जी अर जिनराज ॥ 3. नैण […]

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Kunthu Prabhu Stavan

17 कुन्थु प्रभु स्तवन प्रभु को समरण कर नीको रे। 1. कुन्थु जिनेश्वर करुणा-सागर, त्रिभूवन सिर टीको रे। प्रभु को समरण कर नीको रे॥ 2. अद्भुत रूप अनूप कुन्थु जिन, दर्शन जग-पी को रे। प्रभु को समरण कर नीको रे॥ 3. वाण सुधा सम उपशम रस नीं, वाल्हौ जगती को रे। प्रभु को समरण कर

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Balihaari Ho Shanti Jinand Ki

16 शान्ति प्रभु स्तवन बलिहारी हो शांति जिणंद की। 1. शांति करण प्रभु शांतिनाथजी, शिवदायक सुखकंद की। बलिहारी हो शांति जिणंद की॥ 2. अमृत-वाण सुधा-सी अनुपम, मेटण मिथ्या मंद की। बलिहारी हो शांति जिणंद की ॥ 3. काम भोग राग द्वेष कटुक फल, विष-बेली मोह-धंघ की। बलिहारी हो शांति जिणंद की ॥ 4. राखसणी रमणी

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Aho Prabhu Param Dev Pyara

15 धर्म प्रभु स्तवन अहो प्रभु परम देव प्यारा। 1. धर्म जिन धर्म तणा धोरी, त्रटक मोह-पाश नाख्या तोड़ी। चरण-धर्म आतम से जोडी, अहो प्रभु परम देव प्यारा ॥ 2. शुकल ध्यानामृत रस लीना, संवेग रसे करि जिन भीना। प्याला प्रभू उपशम ना पीना, अहो प्रभु परम देव प्यारा ॥ 3. जाण्या शब्दादिक मोहजाला, रमणि-सुख

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Payo Pad Jinraj No(Anant Prabhu)

14 अनन्त प्रभु स्तवन पायो पद जिनराज नौं सुध ध्यान निर्मल ध्याय भलां जी कांई ॥ 1. अनंत नाम-जिन चवदमां रे, द्रव्य चौथे गुणठाण। भावे जिन हुवै तेरमे रे, इतलै द्रव्य जिन जाण ॥ 2. जिन चक्री सुर जुगलिया रे, वासुदेव बलदेव । पंचम गुण पावै नहीं रे, ए रीत अनादि स्वमेव ॥ 3. संजम

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Vimal Prabhu Stavan

13 विमल प्रभु स्तवन साहिब ! शरण तिहारै हो। शरण तिहारै, शरण तिहारै, शरण तिहारै हो। विमल प्रभू! सेवक नीं अरदास, आयो शरण तिहारै हो । 1. विमल करण प्रभु विमलनाथजी, विमल आप वर रीत। विमल ध्यान धरतां हुवै निर्मल, तन मन लागी प्रीत ॥ 2. विमल ध्यान प्रभु आप ध्याया, तिण सूं हुवा विमल

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Prabhu Vasupujy Bhajle Prani

12 वासुपूज्य प्रभु स्तवन प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी! 1. द्वादशमा जिनवर भजिये, राग द्वेष मच्छर माया तजिये। प्रभु लाल वरण तन छिब जाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी॥ 2. वनिता जाणी वेतरणी, शिव-सुंदर बरवा हूंस घणी। काम-भोग तज्या किम्पाकाणी, प्रभु वासुपूज्य भजलै प्राणी॥ 3. अंजन-मंजन स्यूं अलगा, बलि पुष्प विलेपन नहिं विलगा। कर्म काट्या ध्यान-मुद्रा ठाणी,

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Shreyans Jineshwaru

11 श्रेयांस प्रभु स्तवन श्रेयांस जिनेश्वरू! प्रणमूं नित बेकर जोड़ है। 1. मोक्ष मार्ग श्रेय शोभता, धार्या स्वाम श्रेयांस उदार रे। जे जे श्रेय वस्तु संसार में, ते ते आप करी अंगीकार है।  ते ते आप करी अंगीकार, श्रेयांस जिनेश्वरू? 2. समिति गुप्ति दुर्धर घणां, धर्म शुकल ध्यान उदार है।  ए श्रेय वस्तु शिवदायिनी, आप

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Shital Prabhu Stwan( Surat Thari Man Base)

10शीतल प्रभु स्तवन सूरत थांरी मन बसै साहिब जी।1. शीतल जिन शिवदायका साहिब जी। शीतल चन्द समान हो, निसनेही।  शीतल अमृत सारिषा साहिब जी। तप्त मिटै तुम ध्यान हो, निसनेही॥ 2. वंदै निंदै तो भणी साहिब जी ! राग द्वेष नहीं ताम हो, निसनेही।  मोह-दावानल मेटियो साहिब जी ! गुण-निप्पन तुम नाम हो, निसनेही ॥

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Suvidhi Bhajiye Sirnami Ho

9 सुविधि प्रभु स्तवन सुविधि भजियै शिरनामी हो। 1. सुविधि करि भजियै सदा, सुविधि जिनेश्वर स्वामी हो। पुष्पदंत नाम दूसरो, प्रभु अंतरयामी हो॥ 2. श्वेत वरण प्रभु शोभता, वारू वाण अमामी हो। उपशम रस गुण आगली, मेटण भव भव खामी हो॥ 3. समवसरण बिच फाबता, त्रिभुवन-तिलक तमामी हो। इंद्र थकी ओपै घणां, शिव-दायक स्वामी हो।

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