Adhyatmik

Adhyatmik, Kabir, Nirgun Bhajan, Satsang

Jeevan Chhoto So

जीवन छोटो सो  (तर्ज – कोरो कांजलियो……) रचयिता : साध्वी अणिमाश्री जीवन छोटो सो, तुं जाग अरे इंसान ! जीवन छोटो सो….. १. के करणो के कर रह्यो, तूं करलै आज विचार ।  के लेकर आयो जग में, तूं के ले ज्यासी लार ।। २. राग-रोष में क्यूं उलझ्‌यो, अब थांरी म्हारी छोड़।  बीत रह्यो […]

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Jag Bande Jag

जाग बंदे ! जाग (तर्ज – एक तेरा साथ…..) साध्वी अणिमाश्री जाग बंदे ! जाग, दुर्लभ नर-तन तूने पाया है। यह हीरा हाथ आया है ।। खो रहा क्यों नश्वर भोगों में, अनमोले जीवन को । तीखें कांटों से भर रहा है क्यों, खिलते उपवन को । अब भी संभल जा तू…. महापुरुषों ने बतलाया

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Pani Re Bale Jyu Jeevan Bah Jyavela

पाणी रे बालै ज्यूं  (तर्ज – इक परदेशी……..) साध्वी अणिमाश्री पाणी रे बालै ज्यू जीवन बह ज्यावैला । भरती बिरियां बोल आड़ो कुण आवैला ।। पाई-पाई जोड़णै में जीवन बीतायो । रात-दिन दौड्‌यो, सोच लाभ के कमायो । भोड़ी तिजोऱ्या, बेटा-पोता खावेला ।। कियां तूं नचितो बैढ्‌यो, सोच अरे बाबला । उलझयो.    क्यूं माया

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Avasr Jagan Ro

अवसर जागण रो ( तर्ज – धरती धोरां री………) रचयिता : साध्वी अणिमाश्री अवसर जागण रो – ३ जागण वालो लाभ उठासी । बो ही समझदार कहलासी । जश रो झंडो बो फहरासी ।। जीवन नै अब सफल बणाणो । मिनख पणे रो मोल पिछाणो ।उल्टी बातां थे मत ताणो ।। सपनै सी है जग

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Ab To Jag Are Insan

अब तो जाग अरे इंसान ! (तर्ज – कितना बदल गया संसार….) रचयिता : साध्वी अणिमाश्री अब तो जाग अरे इंसान ! आया है तूं इस दुनिया में बनकर के मेहमान । मोह नींद में अब तक सोया, जो लाया था वह सब खोया  आज पूछ तूं अपने मन को, बीज धर्म का क्यों नहीं

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Gahre Tal Me Moti Milasi

गहरे तल में मोती मिलसी तर्ज – चांद सी महबूबा…. (रचयिता : साध्वी अणिमाश्री) माटी रै ईं तन पर चेतन ! क्यूं इतो इतरावै है ।  दो दिन री ई चमक-दमक परे गाफिल ! तू भरमावै है ।। धीरे-धीरे चाल रह्यो क्यूं, तेजी स्यूं अब कदम उठा । असली घर में जाणै खातिर, मोह-माया ने

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Jara Soch Le Tu Man Me Syana

जरा सोचले तूं (तर्ज – जरा सामने तो आओ ) रचयिता : मुनि बुद्धमल जरा सोचले तूं मन में स्याणां, थारै जीवन रो के आधार है, झोलो बहज्या कठीनै पून रो, ईरी चंचलता रो के पार है ।। १. झूठी है काया झूठी है माया, झूठो है जीवन रो खेलो झूठा है परिजन झूठा है

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Tan Dhan Ro

तन धन रो ! कांई रै गुमान करे (तर्ज :- दिल करता) रचयिता : साध्वी राजीमती तन धन रो ! कांई है गुमान करै, तन धन रो,  खाली हाथां जावै, करणी रा फल पावै,  क्यूं झूठी दौड़ लगावै ।। स्थायी ।। आज रो गरीब काल, धनी बण ज्यावै है,  करोड़पति सेठ रा भी, भाग उड़

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Suraj Ka Ugna Yad Raha

सूरज का उगना याद रहा (तर्ज : दिल लूटने वाले…) रचयिता : साध्वी कनकश्री सूरज का उगना याद रहा, पर दिन का ढलना भूल गये । पलकों में सपने मंजिल के, पांवों से चलना भूल गये ।। गंभीर समस्याओं का सागर, इधर उधर लहराता है । लहरों के साथ बहे जाते, बांहों से तरना भूल

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Aaukhe Ri Ghadiya Thari Ghatati Hi Jave Re

(तर्ज : तेजा रे..).. रचयिता : मुनि राकेश कुमार आऊखे री घड़ियां थांरी घटती ही ज्यावै हो,  करले कमाई धर्म ध्यान री  समय जो बीत ज्यावै पाछो नहीं आवै हो, ज्योति जगाले अंतर ज्ञान री। सांस रे धागां स्यूं बण्यो जिन्दगी रो हार हो,  टूटण में लागै नहीं देर हो  मन मोहक तसवीर थांरै तन

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