Chaubisi

Ho Prabhu Chand Jineswar Chand Jisa

चन्द्रप्रभु स्तवन (लय: शिवपुर नगर सुहामणो) प्रभु ! चन्द्र जिनेश्वर ! चन्द जिसा। 1. हो प्रभू! चंद जिनेश्वर चंद जिसा, वाणी शीतल चंद सी न्हाल हो। प्रभु! उपशम रस जन सांभल्यां  मिटे करम भरम मोह जाल हो । 2. हो प्रभु! सूरत मुद्रा सोहनी, वारु रूप अनूप विशाल हो। प्रभु! इंद्र शची जिन निरखता, ते […]

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Bhajiye Nitya Swami Supas A

7 (लय : कृपण दीन अनाथ ए) सुपार्श्वप्रभु स्तवन भजियै नित्य स्वामी सुपास ए। 1. सुपास सातमां जिणंद ए, ज्यांनै सेवै सुर नर बंद ए। सेवक पूरण आश ए, भजिये नित्य स्वामी सुपास ए॥ 2. जन प्रतिबोधण काम ए, प्रभु बागरै वाण अमाम ए। संसार स्यूं हुवै उदास ए, भजिये नित्य स्वामी सुपास ए॥ 3.

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Padam Prabhu Nit Samriye

6 पदम प्रभू नित समरियै। 1. निर्लेप पदम जिसा प्रभू, प्रभु पद्म पिछाण।  संयम लीधो तिण समै, पाया चोथो नाण ॥ 2. ध्यान शुकल प्रभु ध्याय नें, पाया केवल सोय। दीनदयाल तणी दशा, कैणी नावै कोय ॥ 3. सम दम उपशम रस भरी, प्रभु! आपरी वाण।  त्रिभुवन तिलक तूं ही सही, तूं ही जनक समान

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Sumati Jineswar Sahib Shobhta

5 सुमति प्रभु स्तवन (लय : मूरख जीवड़ा रे गाफल मत रहे) सुमति जिनेश्वर साहिब शोभता। 1. सुमति जिनेश्वर साहिब शोभता, सुमति करण संमार सुमति जप्यां थी सुमति बधे घणी, सुमति सुमतिदातार ॥ 2. ध्यान सुधारस निरमल ध्याय ने पाम्या केवल नाज। बाण सरस वर जन बह तारिया, तिमिर हरण जगभाण ॥ 3. फटिक-सिंहासण जिनजी

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Abhinandan Bandu Nit Nirmali

4 अभिनन्दन प्रभु स्तवन अभिनंदण वांदू नित्य मनरली।(लय : सती कलूजी हो थाया संजम नै त्यार) 1. तीर्थकर हो चोथा जग छांड गृहवास करी मति निरमली। विषय-विटंबण हो तजिया विष फल जाण ॥ 2. दुःकर करणी हो कीधी आप दयाल, ध्यान सुधारस सम दम मन गली। संग त्याग्यो हो जाणी माया-जाल ॥ नके। 3. वीर

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Sanbhav Sahib Samriye

3 संभव प्रभु स्तवन संभव साहिब समरियै।(लय : हूँ बलिहारी हो जादवां) 1. संभव साहिब समरिये, घ्यायो है जिन निर्मल ध्यान के। एक पुद्गल दृष्टि थाप नै, कीधो है मन मेरू समान के॥ 2. तन-चंचलता मेट नै, हुआ है जग थी उदासीन के।  धर्म शुकल थिर-चित्त धरै, उपशम-रस में होय रह्या लीन के।।॥ 3. सुख

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Aho Prabhu Tum Hi Dayak Shiv Panth Na(Ajitprabhu) 2

2 (लय : अहो प्रिय तुम बाट पाड़ी) अजितप्रभु स्तवन अहो प्रभु ! तुम ही दायक शिव-पंथ ना। 1. अहो प्रभू! अजित जिनेश्वर आपरो, ध्याऊं ध्यान हमेश हो। अहो प्रभु ! अशरण शरण तूं ही सही, मेटण सकल कलेश हो॥ 2. अहो प्रभु ! उपशम रस भरि आपरी, वाणी सरस विशाल हो। अहो प्रभु! मुगति-निसरणी

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Chobosi Dohe (duha)

चौबीसी श्रीमज्जयाचार्य दूहा १. ॐ नमः अरिहन्त अतनु, आचारज उवझाय ।  मुनी पंच परमेष्ठि नुं, ऊंकार रै मांय ।। २. बलि प्रणमूं गुणवंत गुरु, भिक्खू भरत मझार ।  दान दयादिक छाण नै, लीधो मारग सार ।। ३. भारीमाल पट भलकता, तीजै पट ऋषिराय ।  प्रणमूं मन वच काय करी, पांचूं अंग नमाय ।। ४. सिध

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Aadinath Stuti

1 आदिनाथ स्तवन (लय : ऐसे गुरु किम पाइयै) प्रणमूं प्रथम जिनन्द नैं जय जय जिन चंदा 1. वन्दू बेकर जोड़ नें, जुग आदि जिनिन्दा ।  कर्म-रिपु-गज ऊपरै, मृगराज मुनिन्दा ॥ 2. अनुकूल प्रतिकूल सम सही, तप विविध तपंदा।  चेतन तन भिन लेखवी, ध्यान शुकल ध्यावंदा ॥ 3. पुद्गल-सुख अरि पेखिया, दुख-हेतु भयाला।  विरक्त चित

Deshbhakti

Arun Yah Madhumay Desh Hamara

अरुण यह मधुमय देश हमारा जयशंकर प्रसाद यह गीत जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखा गया है। इसे उनकी अमर कृति ‘भारत महिमा से लिया गया है। इस प्रसिद्ध गीत को 12 अलग-अलग धुनों में संगीतबद्ध किया जा चुका है। अरुण यह मधुमय देश हमारा ।  जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा ।। सरल तामरस

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