Jain Bhajan

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Piya Girnar Na Jao

पिया गिरनार ना जाओ (तर्ज : कर सोला सिणगार, चाली पाणी ने पणिहार….)  पिया गिरनार ना जाओ, तुम्हें राजुल बुलाती है, तुम्हें राजुल…। मुझे ना छोड़कर जाओ, तुम्हें राजुल बुलाती है, तुम्हे राजुल…।। ध्रुव ।। पिया लौटा के रथ अपना, क्यूं मेरे दिल को तोड़ा है,  तुम्हें करुणा जो प्यारी है, मुझे रोती क्यों छोड़ा […]

Jain Bhajan

Goutam Gandhar Bade Mahan

गौतम गणधर बड़े महान (लय : रघुपति राघव राजाराम) रचयिता : साध्वी राजीमतीजी गौतम गणधर बड़े महान, रिद्धि-सिद्धि का देते दान। जिनके जप से नवों निधान, मिलता सच्चा आत्मिक ज्ञान।। ध्रुव।। 1. महावीर के शिष्य बड़े, करते घन्टों ध्यान खड़े।  बिना सहारे शिखर चढ़े, बन गये ज्ञानी बिना पढ़ें ।। 2. गौतम जप से मिटते

Jain Bhajan

Rakho Hirade Me Mangal Vitrag Bhawna. ,&. Om Mangalam

(लय : चमकै दुनिया में) मंगल वीतराग भावना राखो हिरदै में मंगल वीतराग भावना, अपणो कल्याण करसी अपणी साधना, मंगल वीतराग भावना ।। जागै भीतर में शक्ति वर्धमान ज्यू, भक्ति हनुमान ज्यू, विरक्ति भरत महान ज्यू, मुक्ति जम्बू प्रधान ज्यू,  मंगल वीतराग भावना ।। १. रिषभ अजित संभव अभिनन्दन, सुमति पदम सुखकारी है, श्री सुपार्श्व

Jain Bhajan, Paryushan

Man Ne Saf Rakhije(khamat Khamna)

मन ने साफ राखीजै (तर्ज : माता वदनाजी रो लाडली……….) -साध्वी श्रीराजीमतीजी रे चेतन! जीणो है दिन च्यार, मन नै साफ राखीजै। रे मनवा! पापां रो ओ भार, सिर पर मतना बांधीजै ।। 1. मन नै साफ राखणियां तो कोई-कोई है।  मैली वृत्त्यां पर नियंत्रण, पूरी-पूरो राखीजै। 2. मन है चंदन-बाग, मन है काटां री

Jain Bhajan

He Vitrag Bhawa Paar Karo

(लय : महावीर मुझे ज्योतित करदो…) * वीतराग ! भव पार करो हे वीतराग ! भव पार करो । कण-कण में समता भाव भरो ।। १. श्री ऋषभ, अजित, संभव स्वामी, है अभिनन्दन अन्तर्यामी । जिन सुमति, पद्म, सुपार्श्व स्मरो,  हे वीतराग। भव पार करो ।। २. श्री चन्द्र, सुविधि, शीतल सुखकर, श्रेयांस, वासुजिन, विमल

Bhachya, Jain Bhajan

Chandan Bala

चन्दनवाला की ढाल (लय : जिया बेकरार है..) जिया बेकरार है, हृदय की पुकार है। आ जाओ महावीर प्रभु, तेरा इंतजार है।। ध्रुव ।। राजकन्या है दधिवाहन की, महलो की मतिहारी हो।  तीन दिवस से पड़ी अकेली, कर्मों की गति भारी हो।  कोई न पूछनहार है, नहीं किसी से  प्यार है ।।१ ।।  हाथ पांव

Jain Bhajan

Tirthankar Chobis Nit Uth Dhyan Dharu Ji Dhyan Dharu

मंगल स्तुति (लय : चांद चढ्यो गिगनार) तीर्थंकर चौबीस तीर्थंकर चौबीस नित उठ ध्यान धरूं जी, ध्यान धरूं । मंगलमय जगदीश, महिमा गान करूं जी, गान करूं ।। १. रिषभ, अजित भगवान संभव सुखकारी जी, सुखकारी । अभिनंदन जग त्राण, सुमति जयकारी जी, जयकारी ।। २. पद्म सुपारसनाथ, चंदन चंद्रप्रभु जी, चंद्र प्रभु । सुविधि,

Jain Bhajan, Santhara

Samyag Gyani Samyag Darshi (संथारा)

निर्वाण का मार्ग (तर्ज कितना बदल गया इन्सान) सम्यग ज्ञानी, सम्यग दर्शी, सम्यग् संयमवान,  उसी को मिलता है निर्वाण। शास्त्र शास्त्र में, स्थान स्थान पर बोल गए भगवान, उसी को मिलता है निर्वाण । टेर।। जीव तत्व हूं, जड़ से निराला, पुण्य शुभ है पाप है काला। संवर बाध है, आश्रव नाला, बंध बंध निर्जरा

Jain Bhajan

Bhor Bhor Uth Kar Prabhu Ne Sumirle

मंगल स्तुति (लय : बादळियो..) रचयिता : साध्वी जतनकुमारीजी भोर-भोर उठ कर प्रभू भोर-भोर उठ ‘कर प्रभू नै सुमरलै भव-जल तूं तर ज्यावैला ओ , मनवा ।  प्रभू नाम च्यांनणिये स्यूं आंगणियै नै भरलै,  अंधियारो मिट ज्यावैला, ओ मनवा ।। १. ऋषभ, अजित, संभव, अभिनन्दन है,  सुमति, पद्म, सुपार्श्व जग वंदन बंधनहै  सब कट ज्यावैला,

Jain Bhajan, Paryushan

Atma Ki Pothi Padhne Ka Yah Sunder Avasar Aaya Hai

पर्युषण गीत सान्निध्य-समणी निर्देशिका डॉ निर्वाणप्रज्ञा आत्मा की पोथी पढ़ने का यह सुंदर अवसर आया है । सोपान यही है चढने का मस्तिष्क मनुज का पाया है। संवत्सर का संदेश सुने निर्मल मन निर्मल काया है। 1. जीवन की पोथी के पहले, पन्ने में मैत्री मंत्र लिखो सिर दर्द समूल मिटाने का यह सुंदर अवसर

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