Nirgun Bhajan

Adhyatmik, Kabir, Nirgun Bhajan, Satsang

Gahre Tal Me Moti Milasi

गहरे तल में मोती मिलसी तर्ज – चांद सी महबूबा…. (रचयिता : साध्वी अणिमाश्री) माटी रै ईं तन पर चेतन ! क्यूं इतो इतरावै है ।  दो दिन री ई चमक-दमक परे गाफिल ! तू भरमावै है ।। धीरे-धीरे चाल रह्यो क्यूं, तेजी स्यूं अब कदम उठा । असली घर में जाणै खातिर, मोह-माया ने […]

Adhyatmik, Kabir, Nirgun Bhajan, Satsang

Jara Soch Le Tu Man Me Syana

जरा सोचले तूं (तर्ज – जरा सामने तो आओ ) रचयिता : मुनि बुद्धमल जरा सोचले तूं मन में स्याणां, थारै जीवन रो के आधार है, झोलो बहज्या कठीनै पून रो, ईरी चंचलता रो के पार है ।। १. झूठी है काया झूठी है माया, झूठो है जीवन रो खेलो झूठा है परिजन झूठा है

Adhyatmik, Kabir, Nirgun Bhajan, Satsang

Tan Dhan Ro

तन धन रो ! कांई रै गुमान करे (तर्ज :- दिल करता) रचयिता : साध्वी राजीमती तन धन रो ! कांई है गुमान करै, तन धन रो,  खाली हाथां जावै, करणी रा फल पावै,  क्यूं झूठी दौड़ लगावै ।। स्थायी ।। आज रो गरीब काल, धनी बण ज्यावै है,  करोड़पति सेठ रा भी, भाग उड़

Adhyatmik, Kabir, Nirgun Bhajan, Satsang

Suraj Ka Ugna Yad Raha

सूरज का उगना याद रहा (तर्ज : दिल लूटने वाले…) रचयिता : साध्वी कनकश्री सूरज का उगना याद रहा, पर दिन का ढलना भूल गये । पलकों में सपने मंजिल के, पांवों से चलना भूल गये ।। गंभीर समस्याओं का सागर, इधर उधर लहराता है । लहरों के साथ बहे जाते, बांहों से तरना भूल

Adhyatmik, Kabir, Nirgun Bhajan, Satsang

Aaukhe Ri Ghadiya Thari Ghatati Hi Jave Re

(तर्ज : तेजा रे..).. रचयिता : मुनि राकेश कुमार आऊखे री घड़ियां थांरी घटती ही ज्यावै हो,  करले कमाई धर्म ध्यान री  समय जो बीत ज्यावै पाछो नहीं आवै हो, ज्योति जगाले अंतर ज्ञान री। सांस रे धागां स्यूं बण्यो जिन्दगी रो हार हो,  टूटण में लागै नहीं देर हो  मन मोहक तसवीर थांरै तन

Adhyatmik, Kabir, Nirgun Bhajan, Satsang

Kya Lekar Tu Says Jagat Me

क्या लेकर तू आया जगत में  (तर्ज : चाँद सी दीवार न तोड़ी……) क्या लेकर तूं आया जगत में, क्या लेकर तूं जायेगा । सोच समझ ले रे बन्दे, नहीं आखिर तूं पछतायेगा ।। बचपन बीता इन गलियों में, यौवन भी रंग रलियों में, खूब सजाया, तूने तन को, फूलों और कभी कलियों से ।

Adhyatmik, Kabir, Nirgun Bhajan, Satsang

Chetan Chidanand Charna Me

चेतन ! चिदानन्द चरणां  तर्ज : वृन्दावन का कृष्ण कन्हैया….  रचयिता : आचार्यश्री तुलसी चेतन ! चिदानन्द चरणां में, सब कुछ अरपण कर थांरो,  सफल बणां तूं सत-संगत में, मूंघा मोलो मिनख जमारो ।।  खाली हाथां आयो है तूं, जासी खाली हाथां रे,  लारै रहसी इण दुनिया में, जस अपजस री बातां रे,  थोड़े जीणे

Adhyatmik, Kabir, Nirgun Bhajan, Satsang

Hansa Nikali Gayo Kaya Se

हँसा निकल गयो काया हँसा निकल गयो काया से खाली पड़ी रही तस्वीर,  पड़ी रही तस्वीर खाली पड़ी रही तस्वीर ।।  वही नयन मुख वही नासीका वही भ्रकुटि वही वीर,  वही देह और वही धरणी, पर उड़ गया पंछी पीर ।। १ ।। मात-पिता और बहिन भाणजी, कहे विलायो वीर,  जला-तली देकर कहे सारा, टुटया

Adhyatmik, Kabir, Nirgun Bhajan, Satsang

Tane Ajab Banayi Bhagwan

माटी का तन माटी का माटी का तन माटी का-माटी का तन माटी का,  तने अजब बणायो भगवान, खिलौना माटी का,  तने सुन्दर बणायो भगवान, खिलौना माटी का ।। नैन दिया तने हरि दर्शन ने, तने कान दिया सुन ज्ञान ।। १ ।। दांत दिया थारे मुखड़े री शोभा, तने जीभ दिनी रट रांग ।।

Adhyatmik, Kabir, Nirgun Bhajan, Satsang

Thari Kaya Ro Gulabi Rang

थारी काया रो गुलाबी रंग (तर्ज : थारी आँख्या में लोही रो). थारी काया रो गुलाबी रंग उड़ जासी, उड़ जासी रे फिको पड़ जासी ।। 1 हस्या-हरया रुँखड़ा उगीया रे बाग में, पान-फूल एक दिन झड़ जासी ।। .2सूरज उगीयो दोफारो तपियो, साझं पड़या सूरज ढल जासी ।। 3रैन बसेरो पंछि किन्हो, भोर भया

Scroll to Top