Satsang

Adhyatmik, Kabir, Nirgun Bhajan, Satsang

Mandir Masjid Girja Ghar Me

मन्दिर मस्जिद गिरजाघर (लय : खड़ी नीम के नीचे) मन्दिर मस्जिद गिरजाघर में बांट दिया भगवान को,  धरती बांटी, सागर बांटे, मत बांटो इन्सान को ॥ ध्रुव ॥ अभी यह राह तो शुरू हुई है लेकिन मन्जिल दूर है, उजियाला महलों में बंदी, हर दीपक मजबूर है। मिला न सूरज का संदेशा, मत रोको प्रस्थान […]

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Ke Kare Bharoso Kal Ro

• के करै भरोसो काल रो (लय : आ बाबासा री लाड़ली…….) के करै भरोसो काल रो अणचिन्त्यो आवैला,  ओ माटी रो महल एक पल में ढह ज्यावैला। बड़ा-बड़ा मनसूबा बांधै ऊंची भरै उड़ान रे,  अपणी मो में बण्यो बावलो भूल गयो भगवान रे  सूरज से जीवन ने ओ राहू गह ज्यावैला । समै-समै पर

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Samay O Beet Jyavelo

• समय ओ बीत ज्यावैलो (लय : धर्म की लौ जलायें…) समय ओ बीत ज्यावैलो । जाग, फिर ओ अवसर थारै, हाथ न आवैलो ॥ १. फूल झूलतो टहणी स्यूं, झटकै नीचे गिर ज्यावै,  हर्या-भर्या रूंखां रा पल में, पान-पता खिर ज्यावै।  बिजली रो आखिर झबकारो, ओ छुप ज्यावैलो ॥ २. थांरी म्हांरी में ओ

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Karmo Ki Chal Nirali Hai

चाल कर्म की (लय : यदि भला किसी का कर न सको तो) कर्मों की चाल निराली है, ये बात सभी ने मानी है ना जाने कब ये जाय बदल, इसकी गति तो अनजानी है जबसे सृष्टि का रुप बना, जीवन-मृत्यु का दौर चला, तबसे कर्मों का ये चक्कर, जग के जीवो के साथ चला

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Jeevan Chhoto So

जीवन छोटो सो  (तर्ज – कोरो कांजलियो……) रचयिता : साध्वी अणिमाश्री जीवन छोटो सो, तुं जाग अरे इंसान ! जीवन छोटो सो….. १. के करणो के कर रह्यो, तूं करलै आज विचार ।  के लेकर आयो जग में, तूं के ले ज्यासी लार ।। २. राग-रोष में क्यूं उलझ्‌यो, अब थांरी म्हारी छोड़।  बीत रह्यो

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Jag Bande Jag

जाग बंदे ! जाग (तर्ज – एक तेरा साथ…..) साध्वी अणिमाश्री जाग बंदे ! जाग, दुर्लभ नर-तन तूने पाया है। यह हीरा हाथ आया है ।। खो रहा क्यों नश्वर भोगों में, अनमोले जीवन को । तीखें कांटों से भर रहा है क्यों, खिलते उपवन को । अब भी संभल जा तू…. महापुरुषों ने बतलाया

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Pani Re Bale Jyu Jeevan Bah Jyavela

पाणी रे बालै ज्यूं  (तर्ज – इक परदेशी……..) साध्वी अणिमाश्री पाणी रे बालै ज्यू जीवन बह ज्यावैला । भरती बिरियां बोल आड़ो कुण आवैला ।। पाई-पाई जोड़णै में जीवन बीतायो । रात-दिन दौड्‌यो, सोच लाभ के कमायो । भोड़ी तिजोऱ्या, बेटा-पोता खावेला ।। कियां तूं नचितो बैढ्‌यो, सोच अरे बाबला । उलझयो.    क्यूं माया

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Avasr Jagan Ro

अवसर जागण रो ( तर्ज – धरती धोरां री………) रचयिता : साध्वी अणिमाश्री अवसर जागण रो – ३ जागण वालो लाभ उठासी । बो ही समझदार कहलासी । जश रो झंडो बो फहरासी ।। जीवन नै अब सफल बणाणो । मिनख पणे रो मोल पिछाणो ।उल्टी बातां थे मत ताणो ।। सपनै सी है जग

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Ab To Jag Are Insan

अब तो जाग अरे इंसान ! (तर्ज – कितना बदल गया संसार….) रचयिता : साध्वी अणिमाश्री अब तो जाग अरे इंसान ! आया है तूं इस दुनिया में बनकर के मेहमान । मोह नींद में अब तक सोया, जो लाया था वह सब खोया  आज पूछ तूं अपने मन को, बीज धर्म का क्यों नहीं

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Gahre Tal Me Moti Milasi

गहरे तल में मोती मिलसी तर्ज – चांद सी महबूबा…. (रचयिता : साध्वी अणिमाश्री) माटी रै ईं तन पर चेतन ! क्यूं इतो इतरावै है ।  दो दिन री ई चमक-दमक परे गाफिल ! तू भरमावै है ।। धीरे-धीरे चाल रह्यो क्यूं, तेजी स्यूं अब कदम उठा । असली घर में जाणै खातिर, मोह-माया ने

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